
दीपावली महापर्व हिंदुओं का सबसे बड़ा पर्व है। इसकी पांच दिवसीय उत्सव श्रंखला बहुत ही प्रेरणादायक है।
छोटी दीपावली, नरक चतुर्दशी:-
छोटी दीपावली अर्थात रूप चौदस 3 नवंबर को मनाई जाएगी। यद्यपि 3 नवंबर को प्रातः 9:02 तक त्रयोदशी तिथि रहेगी।
उसके पश्चात पूरे दिन चतुर्दशी का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था इसलिए इसे नरक चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन स्नान करने से पहले अपने शरीर पर उबटन अथवा तेल की मालिश करने का भी विधान है।
यह व्यक्ति की सुंदरता बढ़ाता है इसलिए इसको रूप चतुर्दशी भी कहते हैं। इस रात्रि हनुमान जी की पूजा भी की जाती है। शाम को स्थिर लग्न में ही हनुमान जी का पूजन करना व भोग लगाने का विधान है।
4 नवंबर को कार्तिक अमावस्या को दीपावली का महापर्व मनाया जाएगा। अंधकार को भी अपने छोटे से प्रकाश से चुनौती देते हुए दीपक हमें संघर्ष में स्थिर रहना सिखाते हैं। इसलिए यह दीपावली का नाम दिया गया है। इस वर्ष दीपावली 4 नवंबर 2021 दिन गुरुवार को स्वाति नक्षत्र में मनाई जाएगी। गुरुवार को स्वाति नक्षत्र होने से स्थिर योग बनता है। और इस दिन यह योग पूरे दिन और रात रहेगा।
अधिकतर व्यापारी और जन सामान्य स्थिर योग व लग्न को बहुत शुभ मानते हैं ।ऐसा कहते हैं कि ऐसे पुण्य महायोग में अथवा लग्न में दीपावली पूजन करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में लक्ष्मी स्थिर हो जाती है।
प्रदोष काल के बाद मध्य रात्रि तक गृहस्थी लोग अपने अपने घरों में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी गणेश जी का पूजन करते हैं। अथवा किसी विद्वान से कराते हैं।
इसके लिए श्रेष्ठ मुहूर्त इस प्रकार है:
सर्वप्रथम दीपावली पूजन के शुभ समय को ध्यान रखते हुए दीपावली पूजन की सभी सामग्री तैयार कर ले।
रोली ,चावल ,कलावा ,पान, सुपारी, लौंग ,इलायची ,बताशे, मिष्ठान, इत्र ,फल ,पुष्प माला , गुलाब और कमल के फूल ,सेव,अनार आदि फल , इसके साथ साथ, लक्ष्मी गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति ,श्री यंत्र ,कुबेर यंत्र , कमलगट्टे लक्ष्मी कौड़ी ,श्रीफल एकाक्षी नारियल आदि लक्ष्मी वर्धक वस्तुएं भी लक्ष्मी गणेश जी के पूजन के समय रखें।
श्री गणेश ,इंद्र ,वरुण ,कुबेर ,नवग्रह देवताओं के पूजन के पश्चात महालक्ष्मी का आवाहन करें और पूजा करें।अपने घर में अथवा दुकान में बहीखाता ,कंप्यूटर आदि का भी पूजन करें। क्योंकि पूरे वर्ष भर इन्हीं पर व्यापारिक और आर्थिक गतिविधियां होती हैं। एक थाली में 11 या 21 मिट्टी के दीए जलाएं और दीप मालिका पूजा करके उन्हें द्वार , छत और घर के अन्य स्थानों पर रख दें। बाद में श्री गणेश और लक्ष्मी जी की आरती कर खीर बताशे, मिष्ठान आदि का भोग लगाएं वह प्रसाद वितरण करें।
धनतेरस को लाए हुए मिट्टी के लक्ष्मी गणेश का पूजन करें और अगले दिन पुराने लक्ष्मी गणेश मंदिर से हटा कर उनका विसर्जन कर दें और नए लक्ष्मी गणेश मंदिर में स्थापित करें।
5 नवंबर को गोवर्धन की पूजा होगी। गोवर्धन के यहां कई अर्थ है ।सबसे पहले गोवर्धन पर्वत जिसे भगवान कृष्ण ने ब्रज वासियों की रक्षा करने के लिए अपने उंगली पर उठाकर आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था। गोवर्धन अर्थात गौधन का पालन, पोषण, संरक्षण और संवर्धन करना।
भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए ग्रामीण अंचलों में गोवर्धन के दिन शाम के समय गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है उसमें गोबर से चरागाह, घास , छोटे-छोटे पशु आदि बना करके उनका पूजन किया जाता है और अपने पशुओं के गले में सुंदर से घंटी अथवा पट्टा बांध देते हैं।
गोवर्धन पूजन के लिए भी शाम को वृषभ लग्न उत्तम रहेगा।
इस दिन मंदिरों में अन्नकूट प्रसाद तैयार किया जाता है और 56 व्यंजनों का भगवान श्री कृष्ण को भोग लगाया जाता है।
6 अक्टूबर को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा ।बहन अपने भाइयों के लंबी आयु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए भाइयों को तिलक करती हैं और उपहार देती हैं। भाई भी उन्हें सम्मान पूर्वक उपहार देते हैं। अमृत सिद्धि योग में यह पर्व शाम को 19:44 बजे तक मनाया जाएगा
भैया को तिलक करने का शुभ मुहूर्त:-
प्रातः 7:25 बजे से 9: 00 बजे तक के वृश्चिक लग्न (स्थिर लग्न) श्रेष्ठ है। इसके पश्चात 9:00 बजे से 10:30 बजे तक राहु काल रहेगा जो तिलक करने के लिए वर्जित है।
कुंभ लग्न अर्थात मध्यान्ह 11:45 बजे से 14:57 बजे तक भाइयों को मंगल तिलक करना बहुत शुभ है। शाम को 17:58 बजे से 19:44 बजे तक भी बहने भैया का तिलक कर सकती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विश्वकर्मा, चित्रगुप्त पूजा भी की जाती है।
व्यापारिक संस्थानों में फैक्ट्रियों में व्यापारी, उद्योगपति इस दिन भगवान विश्वकर्मा एवं चित्रगुप्त की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। इस तिथि को यम द्वितीया भी मनाई जाती है। अपने भाई के रक्षा के लिए यम के नाम का एक दीपक जलाया जाता है।
इस प्रकार पंच दिवसीय यह दीपावली महापर्व संपन्न होता है जो हमारे समाज की चारों वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,शूद्र सभी का प्रतिनिधित्व करता है।
आचार्य शिव कुमार शर्मा,
आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषाचार्य
गाजियाबाद( उत्तर प्रदेश)
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