*वास्तु है सबके लिए*
भाग-2
*ब्रह्मस्थान से ही होता है सही दिशा निर्धारण*
वास्तु नियमों के अनुसार सही दिशा ज्ञान बहुत आवश्यक है।
सही दिशाओं के ज्ञान के लिए ब्रह्मस्थान का जानना जरूरी है ।
भूखण्ड का ब्रह्म स्थान ज्ञात करने की दो विधियां हैं एक -पूरे भूखण्ड या भवन के दोनों विकर्ण खींचकर जहां दोनों विकर्ण मिलें ,वहां ब्रह्मस्थान होता है ।
दूसरे सारे भूखण्ड या भवन को नौ बराबर भागो में बांटे ,बीच का भाग ब्रह्मस्थान होता है,यदि प्लाट बड़ा है तो बीच के भाग को भी नौ भागों में बांट लेंगे।उस स्थान से खड़े होकर कम्पास की सहायता से दिशाओं का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। भवन के कमरों को भी एक स्वतन्त्र इकाई मानकर उपरोक्त विधि से उस कक्ष का भी ब्रह्मस्थान ज्ञातकर दिशाओं का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं
ब्रह्मस्थान वास्तु पुरुष की नाभि माना जाता है।जैसे मानव शरीर में नाभि का महत्वपूर्ण स्थान है,उसी से हमारा शरीर सन्तुलन बनाए रखता है। नाभि के द्वारा माता के गर्भ में बालक की जीवन प्रणाली संचालित होती है।उसी प्रकार भवन का ब्रह्म स्थान नाभि के रुप में बहुत महत्वपूर्ण है।
इस स्थान को पूर्णतया खाली रखें। कोई निर्माण व दीवार ब्रह्म स्थान पर नहीं होनी चाहिए । कोई भारी वस्तु उस स्थान पर न रखें।।
यदि किसी भवन, ओफिस, फैक्ट्री में ब्रह्मस्थान दूषित है , दीवार, कोई जीना, पूजा घर ,भारी वस्तु होती है तो वह स्थान अपने मालिक को अर्श से फर्श पर ला सकता है,बरकत समाप्त हो जाती है, धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ना आरंभ हो जाता है।
पं. शिवकुमार शर्मा ,अध्यक्ष-शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केन्द्र गाजियाबाद,9811893069
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