*श्रीगणेश विराजमान एवं विसर्जन एक अवैदिक परम्परा*
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रतिवर्ष हर्षोल्लास से मनाया जाता है।ऐसा शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन गणेशजी का जन्म हुआ था।
कुछ दशकों से उत्तर भारत में महाराष्ट्र की तरह घरों में श्रीगणेश विराजमान ( स्थापना नही) व विसर्जन की परम्परा आरंभ हो गई है । हिन्दु परिवारों में श्रीगणेश चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक 3,5,7,9,11 दिवसीय गणेश जी की मूर्ति लाते हैं बड़ी श्रद्धा से आरती,भोग , विसर्जन करते हैं।
लेकिन शास्त्रों /पौराणिक कथाओं में कहीं भी ऐसा वर्णित नहीं है।
हमारे घरों में विभिन्न आयोजनों जैसे हवन,पूजन, नामकरण आदि संस्कारों के अन्त में पुरोहित देव विसर्जन करते हुए कहते हैं:
*गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर:।
यत्र ब्रहमाऽदयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन:।।*
किन्तु इस विसर्जन मंत्र से पूर्व यजमान से कहलावते हैं कि श्रीगणेश व लक्ष्मी जी सर्वदा मेरे घर में निवास करे़ंं ।अन्य सभी आवाहित देव अपने अपने स्थानों को पधारने की कृपा करें।
उपरोक्त धार्मिक क्रियाओं से अवगत होता है कि श्रीगणेशजी हमारे घरोंं में पूरे वर्ष रहने वाले देव हैं, जहां श्रीगणेशजी (विवेक, धैर्य, शौर्य, ऋद्धि सिद्धि के प्रदाता) होंगे लक्ष्मी जी भी उन्हीं के वहीं रहेगी। इसीलिए दीपावली पर लक्ष्मी गणेशजी की स्थापना व पूजन कर वर्ष भर सुख, सौभाग्य, समृद्धि की कामना की जाती है ।
इस अवसर पर प्रति वर्ष मिट्टी के लक्ष्मी गणेशजी लाकर अपने पूजा स्थान में पूजन कर स्थापना कर गत वर्ष के पुराने लक्ष्मी गणेशजी की मूर्ति को बिदा कर देते हैं।एक दिन भी हमारा घर लक्ष्मी गणेश से रहित नहीं होता है।
इससे स्वत: सिद्ध होता है कि जब गणेश जी पहले से ही स्थापित हैं उनको गणेश चतुर्थी पर घर पर लाने का कोई शास्त्रीय उल्लेख नहीं है तथा विसर्जन का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।क्या 3,5,7,911 दिन ही गणेश जी हमारे घरों में रहेंगे।बाकी दिनों क्या आप लक्ष्मी गणेशजी के बिना रह पाओगे। बुद्धि, विवेक ज्ञान समृद्धि के प्रदायक गणेश जी सदैव लक्ष्मी जी के साथ ही रहते हैं,जब गणेश जी ही बिदा हो जाएंगे तो लक्ष्मी जी कहां रह पाएंगी अर्थात् जिस घर , समाज में विवेक ,बुद्धि (श्रीगणेश) नहीं तो सुख समृद्धि (लक्ष्मी जी) कैसे टिक पाएंगी।
इसलिए गणेश चतुर्थी को भगवान
गणेश जी की हर्षोल्लास से पूजन करें। किन्तु विराजमान व विसर्जन आदि अवैदिक परम्पराओं को त्याग दें।गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश जी का जन्मोत्सव धूमधाम से मना सकते हैं । यह शास्त्रीय है 10 दिवसीय गणेशोत्सव सर्वप्रथम महाराष्ट्र में 1893 में युवा क्रांतिकारी लोकमान्य तिलक ने किया था इसके पीछे भी एक विशेष कारण था महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य रहा है महाराजा शिवाजी के कुलदेव श्री गणेश जी थे ।माता जीजाबाई ने अपने कुलदेवता कसबा गणपति की स्थापना (विराजमान नहीं, अखंड स्थापना) पुणे में की थी।यह गणेशोत्सव महाराष्ट्र में तब से चला आ रहा था ।लोग बड़े उत्साह से गणेश चतुर्थी को गणेश पूजन करते थे , विसर्जन नहीं करते थे।। लोकमान्य तिलक एक क्रांतिकारी थे ।ओजस्वी वक्ता भी थे ।उन्होंने अपने भाषणों से देश की सोई जनता को जगाने के लिए अधिक से अधिक मंचों से अंग्रेजों के विरुद्ध जनता में जन जागरण करना था, इस उद्देश्य से उन्होंने इस उत्सव को पारिवारिक परंपरा से हटकर सामाजिक उत्सव बना दिया, इससे अब गणेश विराजमान व विसर्जन के नाम से बड़े-बड़े पंडाल बनने लगे। इन गणेशोत्सव पाण्डालों के मंच से अंग्रेजों के अत्याचारों ,उनके विरूद्ध योजनाएं बनाने में होने लगा। इस प्रकार उन्होंने शिव साम्राज्य उत्सव का भी प्रचलन आरंभ किया। बंगाल में भी दुर्गा पूजा को भी सामाजिक उत्सव बनाकर उनके पाण्डालों के मंच से लोगों में देशभक्ति का संचार होने लगा। उस समय के इन आयोजनों से देश में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध लोगों में अप्रत्याशित जागरण हुआ। लोकमान्य तिलक सहित कई क्रांतिकारियों ने इन उत्सवों के माध्यम से लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद किया ।यह उत्सव उस समय की आवश्यकता थी। किंतु हमेशा यह अवैदिक आयोजन देश ,समाज ,परिवार के लिए शुभ नहीं कहा जाएगा। लक्ष्मी गणेश जी हमारे स्थिर देवता हैं। वे हमेशा हमारे घरों में सदैव सुख शांति विवेक समृद्धि प्रदान करते रहे ऐसी कामना है।
पंडित शिवकुमार शर्मा अध्यक्ष- शिव शंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र , गाजियाबाद
मोबाइल 98118 93069
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