सूर्य को अर्घ्य देने का वैज्ञानिक आधार और लाभ

27Oct
*सूर्य को अर्घ्य देने का वैज्ञानिक आधार और लाभ*
साधारण मान्यता है कि सूर्य को अर्घ्य देने से पाप नष्ट हो जाते हैं। स्कंद पुराण में लिखा है कि सूर्य को अर्घ्य दिए बिना भोजन करना पाप कर्म के समान है ।वेद घोषणा करते हैं कि *अथ सन्धयाय यदप:प्रयुक्ते तथा विप्रुषा वजीयुत्वा असुरान् पाध्नन्ति।*
अर्थात संध्या में जो जल का प्रयोग किया  सूर्य को अर्घ्य  के रूप में जाता है वह जल सूर्य की किरणों के माध्यम  से असुरों का नाश करते हैं। सूर्य किरणों द्वारा असुरों का नाश एक अलंकारिक भाषा है। मानव जाति के लिए यह असुर हैं ;बीमारियां -जैसे टाइफाइड ,निमोनिया,फिरंग , राजयक्ष्मा, जिन का विनाश सूर्य की किरणों की दिव्य  प्रभाव से होता है। एंथ्रेक्स के स्पार जो कई वर्षों के शुष्कीकरणसे नहीं मरते ,सूर्य प्रकाश से डेढ़ घंटे में  मर जाते हैं।। 
इसी प्रकार हैजा, निमोनिया ,चेचक, तपेदिक आदि रोगों के घातक कीटाणु गर्म जल में खूब उबालने पर भी नष्ट नहीं होते , किन्तु प्रातः कालीन सूर्य की जल में प्रतिबिम्बित अल्ट्रावॉयलेट किरणों से शीघ्र नष्ट जाते हैं।
सूर्य को अर्घ देने में साधक जल अंजलि में जल लेकर या तांबे के लोटे में जल लेकर सूर्य के सामने खड़ा हो कर जब जल को भूमि पर गिराता है तो प्रातः कालीन सूर्य की सीधी किरणों से अनुबिद्ध होकर वह जल राशि मस्तिष्क से पांव तक साधक के शरीर के समान सूत्र में गिरती हुई सूर्य किरणों से उत्तप्त रंगों के प्रभाव को ऊपर से नीचे तक सारे शरीर में प्रवाहित कर देती है। इसलिए वेद शास्त्रों के अनुसार प्रातः काल पूर्व में मुंह करके उगते हुए सूर्य के सामने और सांयकाल पश्चिम को मुख करके छिपते हुए सूर्य के सामने खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।
*सूर्य को अर्घ्य देना नेत्र ज्योति बढ़ाता है*
प्रातः काल की वेला में सूर्य के प्रतिबिंब को तालाबों और नदियों में देखना पश्चिम देशों में बहुत ही लाभदायक माना जाता है। वहां के वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा करने से नेत्रों को मोतियाबिंद आदि रोगों से बचाया जा सकता है ।भारतीय ग्रंथों में इसके लिए सूर्य को जल देने का विधान आदिकाल से ही चला रहा है। इसका विधान इस प्रकार है: सूर्य उदय के थोड़े ही समय के बाद तांबे के लोटे को जल से भरकर सूर्य की ओर मुंह करके खड़े हो जाए, लोटे को छाती के बीच में रहनी चाहिए और धीरे-धीरे जल की धारा छोड़ना आरंभ करें ।लौटे के उभरे किनारे पर दृष्टिपात करने से आप सूर्य के प्रतिबिंब बिंदु रूप में देखेंगे। उस बिन्दुरूप प्रतिबिंब में ध्यान पूर्वक देखने से आपको सप्तवर्ण  वलय (न्यूटन रिंग) देखने को मिलेगा।
लोटे का किनारा उत्तल (कनवैक्स) होने से सूर्य को लोटे से जल देना उचित माना गया है ।जल देने  के पात्र का किनारा अवतल  होने पर सूर्य बड़े रूप में दिखाई देगा ।ऐसी अवस्था में हमारे नेत्र सूर्य की उष्णता को सहन नहीं कर पाएंगे ।लोटा स्टील, एलुमिनियम और चांदी का न होकर तांबे या पीतल का  ही होना चाहिए ,वही उत्तम रहता है उसके उत्तल किनारों पर समवर्ण वलय से किरणें स्वच्छ दिखाई देते हैं ।इस प्रकार तेज वर्धक और नेत्रों की ज्योति को बढ़ाने वाली शीतल सौम्य राशियों का सेवन करने का महर्षियों ने यह एक सरल क्रम प्रदान किया है। सूर्य को जल देते समय गायत्री मंत्र अथवा ॐ घृणि सूर्याय नमः  का जाप करना भी बहुत उपयोगी है।
*ऐहि सूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगत्पते*।
*अनुकम्पये मां भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:*
इस मंत्र का जाप करके सूर्य को अर्घ देने का विधान है।
पंडित शिवकुमार शर्मा ,आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रत्न।
 अध्यक्ष- शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र ,गाजियाबाद।

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