कोरोना काल में शैक्षणिक गतिविधियां, अभिभावकों को भी अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए-

27Oct
*कोरोना काल में शैक्षणिक गतिविधियां* 
*अभिभावकों को अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना पड़ेगा*- *आचार्य शिवकुमार शर्मा*
हम में से किसी भी व्यक्ति ने नहीं सोचा होगा कि सन 2020 और 21 में कोरोना आएगा और इतनी भयावह स्थिति हो  जाएगी कि सब अपने अपने घरों में कैद हो जाएंगे । व्यापार  का क्या होगा, नौकरियों का क्या होगा और तो और किसी से मिलना जुलना  भी नहीं होगा। यहां तक तो सब ठीक है। लोगों को अपनी जान बचाने को ही प्राथमिकता देनी होगी।
 लेकिन शिक्षा जगत में छात्रों को जो रुकावट आई है ।उसकी भरपाई करना कई वर्षों तक संभव नहीं है। ऐसी विषम परिस्थितियों में कोई भी अभिभावक अपने छात्र को विद्यालय भी नहीं भेज रहा है।
डेढ साल के इस विषम परिस्थितियों के काल को छात्रों ने घर में रहकर किस प्रकार काटा है। उसकी पीड़ा अभिभावक ही जान सकते हैं ।किंतु कई विद्यालयों ने अपने कर्तव्य का पूर्ण रूप से निर्वहन किया है ।प्रत्यक्ष रूप से छात्रों का विद्यालय में आगमन नहीं हो रहा  है।ऐसे में उनके साथ किस प्रकार से व्यवहार किया जाए?  उनकी शिक्षा को आगे कैसे बढ़ाया जाए? उन्हें कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध की जाए? यह सब  कई विद्यालयों के प्रशासन ने किया और विद्यालयों ने  त्वरित कार्रवाई करते हुए छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षा का विकल्प  ढूंढ ही निकाला। 
विद्यालयों के  प्रधानाचार्य और अध्यापकों ने ऑनलाइन शिक्षण के विकल्प के रूप में सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया।
 जूम ऐप के माध्यम से कक्षाएं संचालित की जा रही है। स्क्रीन रिकॉर्डर, फेसबुक आदि के माध्यम से छात्रों को नियमित रूप से कक्षा कार्य, गृह कार्य, अभ्यास कार्य प्रैक्टिकल, एक्टिविटीज, कला, क्राफ्ट एवं अन्य एक्टिविटीज गीत, संगीत ,योगा, आदि कार्यक्रम ऑनलाइन ही कराया जा रहा है। इसके अलावा परीक्षाएं भी ऑनलाइन ही आयोजित की जा रही हैं।
विद्यालय का स्टाफ पूरी तन्मयता से  सुचारू रूप से अध्यापन कर रहा है। और छात्र भी उस में रुचि ले रहे हैं। किंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्ष पढ़ाई और ऑनलाइन पढ़ाई में थोड़ा अंतर तो है ही । लेकिन हमारे पास सबसे बड़ा विकल्प  तो यही है कि छात्र विद्यालय से जुड़े रहे। अपने पाठ्यक्रम को पूरा करते रहे और अपने को अकेला महसूस ना होने दें।
  जो विद्यालय इन गतिविधियों का संचालन कर  रहे है। उनकी सोच अपने विद्यालय के छात्र छात्राओं को कार्य में व्यस्त रखना है ,ताकि उनके छात्र छात्राएं व्यवस्थित रूप से पाठ्यक्रम पूरा कर सकें। विद्यालय की ओर से दिशा निर्देशों का पालन ‌ करते रहे और  प्रत्येक छात्र अपने पाठ्यक्रम में व्यस्त रहें । यह समय अभिभावकों के लिए भी अग्नि परीक्षा का काल है जो अभिभावक अपने बालक को मोबाइल देने से बचा करते थे,आज सारा का सारा विद्यालय मोबाइल पर ही केंद्रित हो गया है।
किंतु इसके अलावा विकल्प भी नहीं था। अब तो अभिभावकों को अपना पैटर्न भी बदलना पड़ेगा, क्योंकि निकट भविष्य में पता नहीं कब तक सरकार की गाइडलाइन आए, छात्रों को कब तक इन विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़े। स्कूल कब आएं, इसका भी पता नहीं चल रहा है।
अभिभावकों को भी विद्यालयों का पूर्ण रुप से सहयोग करना है। अक्सर देखने में आता है कि कई  अभिभावकों व छात्रों के पास   एंड्राइड फोन नहीं होते। उनमें से कई  अभिभावक ऐसे होते हैं जो अपनी आजीविका के लिए बाहर जाते हैं। किंतु फिर भी उनको अपने बच्चों को भविष्य को ध्यान रखते हुए ऑनलाइन व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी ।हमें यह मानकर चलना है कि इस समय ये परिस्थिति एक-दो रही  तो बच्चा घर पर रहेगा। विद्यालय से ऑनलाइन ही पढ़ना पड़ेगा ।इसके लिए उन्हें विद्यालय के नियमों का पालन करना चाहिए।
 अक्सर देखनेआ रहा है कि कुछ अभिभावक विद्यालय में शुल्क जमा नहीं करा रहे हैं।उनका सोचना है कि ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। विद्यालय में फीस क्यों जमा करें। किंतु उन्हें विद्यालय के पक्ष का भी ध्यान देना पड़ेगा ।जो विद्यालय का स्टाफ अध्यापक, कर्मचारी कोरोना के इस विषम काल में भी विद्यालय में आकर आपके बालकों के लिए ऑफलाइन कार्य से ज्यादा कार्य कर रहे है़। अध्यापक  को विद्यालय आकर शिक्षण सामग्री तैयार करना, अभ्यास कार्य तैयार करना, उसकी सेटिंग करना और फिर व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजना, जूम एप पर पढ़ाना ऑफलाइन की अपेक्षा अधिक श्रम साध्य और व्ययसाध्य भी है।
ऐसे में अभिभावकों का भी कर्तव्य बनता है कि वह भी विद्यालय का पूर्ण सहयोग करें ,छात्रों के स्कूल का  सहयोग करने में कोताही ना बरतें। क्योंकि आपको 12 महीने का शुल्क तो  देना ही पड़ेगा ।उसको आप लास्ट तक टालते  रहें । फिर भी समस्त शुल्क एक साथ देने से अच्छा है। महीने दर महीने अपने बालकों का शुल्क जमा करते रहे ।इसलिए विद्यालय को भी अपने टीचर्स की सैलरी  देने के लिए भी कोई परेशानी न उठानी पड़े। अभिभावकों को अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए और छात्रों में गुरु शिष्य की परंपराओं का सम्मान रखते हुए अपने आप में भी कुछ बदलाव करना पड़ेगा  ।इसलिए जब विद्यालय अनवरत कार्य भेज रहा है आपके भी जिम्मेदारी बनती है कि आप भी विद्यालय का पूर्ण सहयोग करें। ताकि छात्र शिक्षा से वंचित ना रहें।
शिवकुमार शर्मा ,उप-प्रधानाचार्य सरस्वती शिशु मंदिर नेहरू नगर गाजियाबाद.

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