ग्रहों के गुण प्रवृत्ति एवं स्वभाव
*बृहस्पति ग्रह*
बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना गया है बृहस्पति ज्ञान में सर्वोत्कृष्ट एवं बुद्धि में चातुर्य एवं ओज व दिव्य गुणों से युक्त बृहस्पति ब्राह्मण वर्ग के ग्रह हैं।
बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी है इनकी उच्च राशि कर्क है और नीच राशि मकर है।
बृहस्पति के मित्र ग्रह सूर्य मंगल और चंद्रमा है ।शुक्र और बुध शत्रु ग्रह हैं। शनि राहु केतु को बृहस्पति सम मानते हैं।
बृहस्पति की दिशा ईशान अर्थात उत्तर पूर्व का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है ।यह धनु के 10 अंशों तक मूलत्रिकोण में रहते हैं।
गुरु का तत्व आकाश है।
हम अक्सर मंत्र जाप या हवन के समय तर्जनी अंगुली को गोमुखी से बाहर कर लेते हैं, हवन में भी तर्जनी उंगली को आहुति से अलग रखा जाता है। इसका कारण यह है कि बृहस्पति आकाश तत्व का ग्रह है और तर्जनी उंगली पर बृहस्पति का आधिपत्य है तो मंत्र जाप व हवन के समय उसको बाहर रखना अर्थात एक प्रकार से आकाशीय तत्वों की ऊर्जा को प्राप्त करना होता है ।
बृहस्पति का रंग गोरा है ।बृहस्पति के देवता ब्रह्मा है।
मेष, सिंह, कर्क और वृश्चिक गुरु की मित्र राशियां है। कन्या, तुला और वृषभ शत्रु राशियां हैं ।
बृहस्पति पुनर्वसु ,विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी होते हैं बृहस्पति की महादशा 16 वर्ष की होती है।
कन्या की जन्मकुंडली में बृहस्पति वक्री, नीचस्थ और शत्रु राशियों में हो तो तो उसके विवाह मैं विलंब होता है। वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं रहता।
बृहस्पति सत्वगुण प्रधान ग्रह है। जिनकी कुंडलियों में बृहस्पति कारक होता है अथवा शुभ अवस्था में होता है तो वह व्यक्ति प्रशासनिक क्षेत्र में अच्छी सफलताएं प्राप्त करता है। अध्यापन ,वकालत ,बैंकिंग पत्रकारिता, ज्योतिष , मैनेजमेंट क्षेत्र में गुरु बहुत सफलता प्रदान करता है।
यदि गुरु केंद्र अथवा त्रिकोण में शुभ भाव का स्वामी हो तो वह अध्यापन और ज्योतिष के क्षेत्र में व्यक्ति को प्रसिद्धि दिलाता है । बुध के साथ बैठा हुआ बृहस्पति बैंकिंग अथवा वकालत में अच्छी सफलता देता है। गुरु ,शुक्र और बुध इन तीनों का एक साथ होना व्यक्ति को प्रभावशाली बनाता है। मैंने कई जन्म कुंडलियों में अध्ययन किया है कि जिनकी कुंडलियों में इन तीनों ग्रहों की युति होती है ,वह बैंक मैनेजर अथवा उच्च अधिकारी, जज और प्रशासनिक अधिकारी तक बन जाता है।
यदि गुरु शुभ प्रभाव में है तो अपनी महादशा में व्यक्ति को चरमोत्कर्ष पर ले जाता है ।ऐसे मेरे सामने कई उदाहरण आए हैं।
यदि कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव दे रहा है तो हमें पीली वस्तुओं का दान करना चाहिए ।चंदन अथवा केसर का टीका लगाएं ।गाय को केले, गुड और चना खिलाएं ।यदि गुरु शुभ भाव का स्वामी होकर नीच प्रभाव में बैठा हुआ है तो उसके लिए हम पुखराज अथवा सुनहला धारण कर सकते हैं।
एक और विशेष बात यदि बृहस्पति वृष राशि का दशम भाव में हो, उस व्यक्ति को मंदिर निर्माण में सहायता नहीं करनी चाहिए और मंदिर भी कम से कम जाना चाहिए। घर पर ही अपनी पूजा करें। ऐसा व्यक्ति यदि मंदिर निर्माण में धन आदि की सहायता करेगा तो अगले वर्षों में उसका दिवाला निकल सकता है। यह अनुभूत है।
पंडित शिवकुमार शर्मा आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रत्न
अध्यक्ष- शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद
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