छप्पन भोग ( स्वरचित कविता)

27Oct
🌹छप्पन भोग🌹
गोपियों के संग  रास रचाये।
कान्हा इसी से रसिक कहाये।
गोपियों के मन बसे कान्हा।
प्रियतम श्याम को ही माना।।
पाने को पति के लिए। 
व्रत कात्यायनी के किये।।
संकल्प लिया और वादे किए।।
श्याम हमें मिल जाएंगे।
छप्पन भोग चढ़ाएंगे।।
तभी से  आरंभ हुए छप्पन भोग।
प्रसन्न हुए ब्रज के सब लोग।। 
तभी से छप्पन भोग लगाने लगे।
 प्रिय कान्हा को मनाने लगे।।
षडरस का पुट दिया।
स्वादिष्ट उनको किया।
मधुर,कषाय,तिक्त रस।
कटु,अम्ल,लवण बस।।
पूरी,चटनी,सिखरन,भात।
कढी,दाल,बाटी के साथ।।
शरबत, मुरब्बा और दही बड़ा।
त्रिकोण,फेनी,मठरी ,पपडा।।
दूध,दही ,मक्खन  और घी।
घेवर, मालपुआ ललचाए जी।
थूली,,लौंगपुरी ,दलिया का स्वाद।
खुरमा,मोदक,परिखा  ,विलसाद।
अधानौ,बिलसारू व महारायता।
जलेबी,घेवर ,चोला ,मलायता।।
शीरा  ,लस्सी,खीर और फेनी।
रसमलाई, दलिया और छैनी।
खुरमा , सौंफ ,मोढ़ व साग।
तांबुल,जल व रबड़ी महाभाग।।
तुलसी दल की महिमा न्यारी।
इन छप्पन भोगों पर भारी।।
-शिवकुमार शर्मा ,अध्यक्ष शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केन्द्र गाजियाबाद
9811893069
Pt.Shiv Kumar Sharma

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