वास्तु है सबके लिए (भाग-6)
—————————————उत्तर दिशा का महत्व
Importance of North direction
वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा का विस्तार 337.5 अंशों से 22.5 अंशों तक होता है। अर्थात् उत्तर दिशा से भूभाग/भूखण्ड की माप आरंभ होती है और यहीं आकर समाप्त होती है।0॰ या 360॰ मध्य बिन्दु पर होता है।
धनाधीश भगवान कुबेर का इस दिशा पर आधिपत्य है। उत्तर दिशा में धन /तिजौरी रखने का स्थान ,स्नानागृह,, पानी का नल, बोरिंग,अण्डरग्राऊंड जल संग्रहण,हल्का निर्माण,हल्का सामान रखना शुभ होता है।
इस दिशा को सदैव खुला,खाली व हल्का रखना चाहिए।जिन व्यक्तियों के भवन की यह दिशा उपरोक्त नियमों के अंतर्गत आती है ,वे सम्पन्न एवं समृद्धि का जीवन बिताते हैं।उस घर में महिलाओं का सम्मान होता है।यदि यह दिशा दोषयुक्त है तो उस घर में धन-संपत्ति का अभाव बना रहता है। महिला सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता है।उत्तर दिशा में रखा हुआ धन निरंतर बढ़ता है। आफिस में कम्प्यूटर एकाउंटेंट्स /मार्केटिंग स्टाफ को इस दिशा में बैठाने से आफिस/ कम्पनी में प्रगति होती है
पं.शिवकुमार शर्मा,
अध्यक्ष –शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केन्द्र गाजियाबाद
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