*20 अक्टूबर को मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा।*
*ब्लू मून के रूप में दिखाई देगा चन्द्रमा*
वर्षा ऋतु बीत जाने पर शरद ऋतु का आरंभ होता है। जो दो माह पूर्व आरंभ हो चुका है। दो महीनों की एक ऋतु होती है अर्थात भाद्रपद और अश्विन मास में शरद ऋतु होती है।
आश्विन मास की पूर्णिमा को यह ऋतु समाप्त होती है इसके पश्चात हेमंत ऋतु आएगी।
मौसम वैज्ञानिकों और हमारे ज्योतिष अनुसंधानकर्ताओं ने खोज की कि वर्षा के बाद आश्विन पूर्णिमा तक अधिकतर वर्षा काल समाप्त हो जाता है। आसमान में धूल आदि का गुब्बार समाप्त होकर निर्मल छवि उत्पन्न होती है जैसा कि कवि श्रीधर पाठक ने कहा है
*काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारका वृन्द खिले*।
*उजियाली दिशा ,छविशाली निशा, अति सोहे धरातल फूले फले।*
वर्षा ऋतु के पश्चात आसमान निर्मल हो जाता है और रात्रि में चारों तरफ चमकते व टिमटिमाते तारे रात्रि की सुंदरता बढ़ा देते हैं।
शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी बहुत कम रहती है ।इस कारण शरद पूर्णिमा का चंद्रमा ब्लू मून के रूप में दिखाई देगा अर्थात चंद्रमा हल्का नीलापन लिए थाली के आकार का दिखाई देगा।
सूर्यास्त के पश्चात भारतीय आकाश चार उदित ग्रहों से सुशोभित होगा।
*सूर्यास्त के पश्चात पूर्व दिशा मे ब्लू मून चंद्रमा की सुंदर छवि ,आकाश के मध्य में बृहस्पति और शनि का एक ही राशि पर मिलन और पश्चिम दिशा की ओर अपनी विशेष चमक से चमकता हुआ शुक्रतारा आकाश की छटा को द्विगुणित करेंगे। ऐसे सुंदर उदित और भव्य ग्रह नक्षत्रों के बीच में शरद पूर्णिमा के त्यौहार का संयोग कई वर्षों बाद आ रहा है।*
आरोग्य शास्त्रों और ज्योतिष में शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणों को आरोग्यकारक कहा है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को रात्रि में कुछ ना कुछ समय चंद्रमा के प्रकाश में रहना चाहिए।
भारतीय परंपरा के अनुसार बहुत से भारतीय लोग खीर बनाकर कुछ समय रात्रि में छत पर रखते हैं ताकि उन्हें चंद्रमा की आरोग्यकारी किरणों से ऊर्जित किया जा सके और उसे खाने से हमारे स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।
शरद पूर्णिमा 20 अक्टूबर को है सत्यनारायण व्रत उसी दिन का है और शरद पूर्णिमा का उत्सव भी।
*पूर्णिमा का व्रत रखने वाले 20 अक्टूबर को व्रत रखेंगे ।क्योंकि रात्रि में पूर्णिमा तिथि 20:26 तक रहेगी जो सर्वथा अनुकूल है।*
जन-जन में भगवान राम के मर्यादित चरित्र को पहुंचाने वाले महर्षि वाल्मीकि का जन्म भी त्रेता युग में इसी शरद पूर्णिमा को हुआ था।
प्रत्येक भारतवासी को शरद पूर्णिमा के दिन महर्षि वाल्मीकि के प्रकाट्योत्सव को भी मनाना चाहिए।
इस दिन अखंड रामायण के पाठ का आयोजन ,सुंदरकांड ,महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण का पाठ, महर्षि वाल्मीकि के चरित्र आदि का आयोजन करना चाहिए जिससे जन-जन में व्याप्त महर्षि वाल्मीकि और भगवान राम को विश्व में अधिक प्रचारित प्रसारित किया जा सके।
पं. शिव कुमार शर्मा
आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषाचार्य, गाजियाबाद
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