*किस प्रकार करें दुर्गा मां की पूजा* *
*मां भगवती को किन वस्तुओं का भोग लगाना चाहिए*
आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो रहे हैं। घर घर में मां दुर्गा मां का आगमन होगा। धूप दीप, सुगंधित द्रव्य व भोज्य पदार्थों से दुर्गा मां की पूजा की जाएगी। घर घर में भक्ति और आनंद का वातावरण होगा।
सबसे बड़ी बात यह होती है कि हमारे दोनों नवरात्र : शारदीय नवरात्र तथा वासन्तिक नवरात्र मौसम की संधि में आते हैं।
शारदीय नवरात्रों से सर्दियां शुरू हो जाती है। जैसा कि हम देखते आ रहे हैं कि यह संधि काल विभिन्न बीमारियों को लेकर आता है ।किंतु इसके समाधान के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने नवरात्र में मां दुर्गा की स्थापना पूजा का विधान बनाया है ।जिससे घर घर में धूप ,दीप, हवन, पूजन आदि सुगन्धित पदार्थों से घर का वातावरण अच्छा रहे ।घर से हानिकारक रोगाणु समाप्त हो जाएं।
*दुर्गा मां की पूजा का विधान।*
नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना, दुर्गा मां का आह्वान आदि करके मां भगवती का जाप अथवा दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
वैसे तो दुर्गा सप्तशती में 13 अध्याय हैं। उनका प्रतिदिन 9 दिन तक पाठ करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले संकल्प, दुर्गा कवच, अर्गला स्त्रोत, कीलक का पाठ करें। उसके पश्चात नवार्ण विधि तथा न्यास करें। उसके पश्चात नवार्ण मंत्र की एक माला का जाप करें। नवार्ण मंत्र इस प्रकार है:
*ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै*
इसके पश्चात दुर्गा सप्तशती के पाठ आरंभ करें ।तेरह अध्याय पूर्ण होने के पश्चात पुनः नवार्ण विधि करें और देवी सूक्त का पाठ पढे।
सभी लोग इस प्रक्रिया को नहीं कर सकते हैं। इसलिए 7 दिन में 13 अध्याय की आवृत्ति इस प्रकार करनी चाहिए।
पहले दिन दुर्गा सप्तशती का प्रथम पाठ करें।
दूसरे दिन द्वितीय और तृतीय पाठ पढ़ें।
तीसरे दिन चौथा पाठ पढ़ें।
चौथे दिन पांचवें, छठे ,सातवें और आठवां पाठ पढ़ें।
पांचवें दिन नौवें और दसवां पाठ करें ।
छठे दिन 11वां पाठ करें।
सातवें दिन बारहवां व तेरहवां पाठ करके आवर्ती पूर्ण करें।
किंतु दुर्गा कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक का पाठ प्रत्येक दिन करें।
दुर्गा कवच का पाठ उच्च स्वर में करना चाहिए ।अर्गला स्तोत्र का पाठ का आरंभ उच्च स्वर में करें और समापन शांत स्वर में करें ।
कीलक हमेशा शांत मुद्रा में करें।
काम्य (मनोकामना पूर्ण कराने के लिए) विधि से दुर्गा मां का पाठ मां भगवती के चरित्र के अनुसार करना चाहिए।
उसकी विधि इस प्रकार है।
दुर्गा कवच ,अर्गला स्तोत्र और कीलक पाठ के पश्चात शक्ति वह बल प्राप्त करने की कामना के लिए दुर्गा मां के प्रथम चरित्र का पाठ करना चाहिए। प्रथम चरित्र में पहला अध्याय आता है।
धन प्राप्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए मध्यम चरित्र का पाठ करें। मध्यम चरित्र में अध्याय 2, 3 और 4 होते हैं। ज्ञान प्राप्ति हेतु उत्तर चरित्र का पाठ करें। उत्तर चरित्र में पाठ पांच से तेरह अध्याय होते हैं। अर्थात उत्तर चरित्र में 9 अध्याय होते हैं।
और जनसाधारण जो पाठ नहीं कर सकते है। वे मात्र नवार्ण मंत्र और आरती ही कर सकते हैं।
मां भगवती की पूजा में भावना प्रधान होती है।
जिस प्रकार खेत में उल्टा सीधा बीज डालने से सभी बीज उग जाते हैं। उसी प्रकार भक्ति, श्रद्धा और भावना के अनुसार की गई पूजा से माता उसको स्वीकार करती है।
दुर्गा पाठ की समाप्ति के पश्चात भगवती मां की आरती करें और विभिन्न पदार्थों से मां का भोग लगाएं।
*भगवती मां को दिन के अनुसार इस प्रकार भोग लगाना चाहिए।*
प्रथम दिन -शैलपुत्री का पूजन, शुद्ध घी या घी से बने हुए पदार्थों का भोग लगाएं।
दूसरे दिन-ब्रह्मचारिणी का पूजन, शक्कर अथवा घी बूरा का भोग लगाएं।
तीसरे दिन: चंद्रघंटा का पूजन, दूध अथवा दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
चौथे दिन -कुष्मांडा का पूजन, मालपुआ या नैवेद्य का भोग लगाएं।
पांचवें दिन- स्कंदमाता का पूजन, केला अथवा नगद का भोग लगाएं।छठें दिन- मां कात्यानी का पूजन, शहद अथवा पंचामृत का भोग लगाएं।
सातवें दिन कालरात्रि का पूजन गुड़ अथवा नैवेद्य का भोग लगाएं।
आठवें दिन -महागौरी का पूजन, नारियल अथवा नारियल से बने मिष्ठान का भोग लगाएं।
नौवें दिन- सिद्धिदात्री का पूजन, तिल अथवा पंचमेवा का भोग लगाएं।
इस प्रकार मां की पूजा और भोग आदि व्यवस्था करने से भगवती माता प्रसन्न होती हैं और अपने साधकों को उनकी पूजा का संपूर्ण फल देती है।
पंडित शिवकुमार शर्मा ,आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषाचार्य
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