*गजच्छाया योग में श्राद्ध करने से पितरों को मिलती हैं मुक्ति।*
*3 अक्टूबर से 6 अक्टूबर तक दो बार बनेगा गजच्छाया योग*।
*गजच्छाया योग में किये हुए श्राद्ध से होती है कर्ज मुक्ति।*
प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषाचार्य महर्षि बौधायन जी के ये श्लोक गजच्छाया योग की पुष्टि करते है:
*यदेन्दु: पितृदैवत्ये* ,
*सूर्यश्चैव करे स्थिता:* ।
*त्रयोदशी तिथौ स्यातां* ,
*गजच्छायेति कीर्तिता*।।
*हंसेकरास्थिते या तु अमावस्या करान्विता।*
*सा ज्ञेया कुंजरच्छाया इति बौधायनोऽब्रवीत्।।*
अर्थात भाद्रपद कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी को मघा नक्षत्र हो, सूर्य हस्त नक्षत्र में हो और यह स्थिति अमावस्या तक बनी रहे तथा चंद्रमा भी अमावस्या को हस्त नक्षत्र में आ जाए। ऐसा योग गजच्छाया योग बनता है।
इस योग में पितरों के निमित्त तर्पण करने से पितरों को अक्षय तृप्ति मिलती है और उनकी मुक्ति हो जाती है।
दूसरे इस योग में श्राद्ध करने से श्राद्ध करने वाले को ऋण से मुक्ति मिलती है और उसको अपने गृहस्थ जीवन में अपार सफलता मिलती है। धन्य धन्य की कोई कमी नहीं रहती है पितरों का पूर्ण आशीर्वाद उनके साथ रहता है।
ऐसा योग कई वर्षों में एक बार आता है।
इस वर्ष श्राद्ध पक्ष में यह योग आश्विन कृष्ण त्रयोदशी अर्थात 3 अक्टूबर को रात्रि 10:39 से 4 अक्टूबर को प्रातः 3:10 बजे तक अर्थात लगभग 4:30 घंटे यह योग बनेगा। क्योंकि इस समय अवधि में मघा नक्षत्र होगा और सूर्य हस्त नक्षत्र में होगा।
इसके पश्चात 6 अक्टूबर को मध्य रात्रि 1:10 बजे से 16:34 बजे तक पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन बनेगा। 15 घंटे 20 मिनट तक का का योग सर्वाधिक उत्तम कहा गया है। क्योंकि इस दिन सूर्य और चंद्रमा हस्त नक्षत्र में होंगे और सर्वपितृ अमावस्या का पुण्य पर्व है। इसमें सभी पितरों के निमित्त विधि विधान से श्राद्ध करने से अपने पितरों को अक्षय मुक्ति की प्राप्ति होती है और श्राद्ध करने वाले को ऋण से मुक्ति पारिवारिक उन्नति और संतान की उन्नति होती है।
शास्त्रों में जैसे स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, वराह पुराण और महाभारत में भी इस गजच्छाया योग का वर्णन है।
कहा तो यह जाता है कि इस दिन किसी तीर्थ क्षेत्र में स्नान करने से तथा अपने पितरों के निमित्त जलांजलि देने से पितरों की तृप्ति होती है।
गजच्छाया का एक अर्थ यह भी है कि किसी नदी किनारे हाथी की छाया में बैठकर अपने पितरों के निमित्त किया गया श्राद्ध ,तर्पण एवं पिंडदान से हमारे पितर संतुष्ट होते हैं, और उन्हें पितृ योनि से मुक्ति मिल जाती है ।
उनके कृपा व आशीर्वाद से उनके वंशजों को बहुत आशीर्वाद मिलते हैं।
पंडित शिवकुमार शर्मा आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषाचार्य, गाजियाबाद।
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