वास्तु है सबके लिए (भाग 22) वास्तु पदों की व्याख्या
* पूर्व दिशा के 8 पद
वास्तु है सबके लिए (भाग 20) में मैंने वास्तु पुरुष के 32 पदों के अनुसार द्वार योजना का वर्णन किया था। इस अंक में मैं पूर्व दिशा के 8 पदों की व्याख्या करूंगा।
पूर्व दिशा के पदों का आरंभ उत्तर पूर्व कोने से होता है।
पूर्व दिशा के 8 भाग 11.25 डिग्री को हम कंपास के माध्यम से नाप लेंगे। प्लॉट की भुजा की माप के अनुसार उसके 8 भाग निश्चित कर लेंगे।
पूर्व दिशा में सबसे पहला पद
E1 अर्थात पूर्व दिशा का पहला पद शिखि कहलाता है।
इस दिशा में अर्थात आठवें भाग में द्वार बनाना अशुभ होता है। इससे धन की हानि ,दुर्घटना का भय और अज्ञात भय का डर हमेशा रहता है।
,E2 अर्थात पूर्व दिशा के आठवें पद में से दूसरा पद पर्जन्य कहलाता है। इस भाग में दरवाजा होने से घर में फिजूलखर्ची बहुत होती है ।धन में बरकत नहीं होती है। परिवार में कन्याओं की अधिकता होती है ।वैसे कन्या का जन्म लक्ष्मी कारक है। आकस्मिक घटनाओं का भय रहता है ।
E3 अर्थात पूर्व दिशा के आठों पद में से तीसरे पद का नाम जयन्त है।यह स्थान द्वार के लिए बहुत उत्तम है ।आर्थिक संपन्नता बढ़ती है। बैंक बैलेंस अच्छा रहता है। और परिवार में खुशियां रहती हैं।
E4 अर्थात पूर्व दिशा के चौथे भाग को इंद्र कहते हैं ।यह दिशा द्वार बनाने के लिए बहुत ही अच्छी है। अगर किसी व्यक्ति के घर का द्वार इंद्र पद पर हो तो बहुत सफलताएं प्राप्त करता है। प्रतियोगिता परीक्षाएं ,उच्च शिक्षा और धन की आवक उत्तम रहती हैं ।परिवार में मंगल कार्य होते रहते हैं।
E5 अर्थात पूर्व दिशा के 5 में भाग का नाम सूर्य है ।यद्यपि नाम बहुत सुंदर है। किंतु उसके विपरीत यह पद द्वार के लिए अशुभ होता है। इसलिए इस पद पर अपना द्वार न बनाएं। परिवार में अक्सर अप्रिय सूचनाएं मिलती हैं एवं दुर्घटनाएं घटती रहती है। इस परिवार के लोग आपस में तालमेल से नहीं रहते हैं ।पड़ोसियों से संबंध अच्छे नहीं रहते हैं।
E6 अर्थात पूर्व दिशा के छठी भाग को सत्य कहते हैं ।नाम के विपरीत इस दिशा में अनुकूलता नहीं रहती है। लोगों में अनिर्णय की स्थिति बनी रहती है। परस्पर क्रोध की भावना ,अविश्वास जन्म लेता है। और महिला सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता है।
E7 अर्थात पूर्व दिशा के सातवें भाग का नाम भ्रंश है। यह दिशा भी द्वार के लिए अधिक शुभ नहीं रहती है ।लोग कठोर निर्णय करते हैं। इससे आपस में तालमेल की कमी रहती है । असंवेदनशीलता ऐसे घरों में अधिक देखी गई है।
इसलिए इस पद पर द्वार बनाना अशुभ ही होता है।
E8 अर्थात पूर्व दिशा के आठवें और अंतिम भाग का नाम आकाश है। इसमे
भाग में भी द्वार बनाना अशुभ होता है ।क्योंकि यह पद दक्षिण दिशा के निकटवर्ती पद होता है। इसलिए ऐसे स्थान पर द्वार बनाने से घर में चोरी का भय रहता है ।आग संबंधी दुर्घटनाएं अधिक होती है ।परस्पर अविश्वास की भावना जन्म लेती है। परिवार की महिला सदस्य अपने को असहज महसूस करती हैं।
इस प्रकार पूर्व दिशा के 8 पदों का वर्णन किया है आगामी लेख में दक्षिण दिशा के आठों पदों का उल्लेख किया जाएगा।
पंडित शिवकुमार शर्मा आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रत्न
अध्यक्ष- शिवशंकर ज्योतिष एवं अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद
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