वास्तु है सबके लिए -भाग 17 *शौचालय और स्नान घर का वास्तु विश्लेषण*
प्राचीन काल में वास्तु ग्रंथों के अनुसार शौचालय का स्थान घर के अंदर नहीं बताया गया है। भारत देश गांव का देश है ।किसान लोग गांव में रहते हैं। शौच हेतु बाहर जंगल में जाते थे।
धीरे-धीरे शहर बसते गये। लोगों ने अपने घरों में ही शौचालय का निर्माण शुरू कर दिया।जो वास्तु शास्त्र के नियमानुसार नहीं है। कहते हैं पहले लोग घर में खाना खाते थे और शौच बाहर करते थे। अब खाना बाहर खाते हैं और शौच घर में करते हैं तो घर में पवित्रता कैसे हो सकती है।
अब तो गांव हो या शहर हर घर में शौचालय और स्नानघर बनाना ही पड़ेगा क्योंकि यह मोदी का भारत है ।घर घर में शौचालय हो ,गांव स्वच्छ हो ऐसा उनका मानना है। तो हम बात करते हैं घर में शौचालय कहां होना चाहिए ?जिससे की घर की पवित्रता भी नष्ट ना हो और शौचालय वास्तु के अनुकूल भी हो। सबसे पहले तो यह बात ध्यान देने की है कि शौचालय और स्नानघर एक साथ नहीं बनानी चाहिए ,क्योंकि शौचालय में राहु का वास होता है, और स्नानघर में चंद्रमा का। यह एक ग्रहण योग है। लेकिन शहरों में छोटे-छोटे मकान हैं वहां पर स्थान की कमी के चलते दोनों को एक साथ ही बनाते हैं ।ऐसा स्थान घर में मिलना मुश्किल है कि जहां पर दोनों का ठीक प्रकार से समायोजन हो सके। शौचालय की सबसे उत्तम दिशा पश्चिम व दक्षिण दिशा है। यदि इन स्थानों पर शौचालय अथवा बाथरूम बनाना संभव ना हो तो वायव्य कोण में अथवा नैऋत्य कोण में भी शौचालय बना सकते हैं ।ईशान कोण अर्थात उत्तर पूर्व , उत्तर या पूर्व में शौचालय नहीं बनाना चाहिए ।शौचालय निर्माण में ध्यान रखें जो भी दिशा हो उस दिशा को बाथरूम और शौचालय को एक इकाई मानकर उसके अंदर शौचालय की सीट और स्नान के नल शावर उचित स्थान पर रखें ।शौचालय की सीट हमेशा दक्षिण अथवा पश्चिम में रखें और स्नान के लिए उसी में उत्तर पूर्व या वायव्य कोण में नहाने के लिए नल अथवा शावर लगाएं।
शौच करते समय हमारा मुंह दक्षिण अथवा उत्तर में ही होना चाहिए पूरब और पश्चिम दिशा इसके लिए वर्जित है ।क्योंकि सूर्य उदय और सूर्यास्त की दिशाओं की ओर मुंह करके शौच करने से स्वास्थ्य खराब हो सकता है ।उदर विकार अथवा गैस की प्रॉब्लम हो सकती है ।यदि शौचालय व स्नानघर का एक दरवाजा है तो सबसे अंदर शौचालय की सीट उसके बाद वास वेशन और दरवाजे के पास नहाने के लिए नल की व्यवस्था होनी चाहिए। जिससे की शौच के बाद हाथ धो कर और नहाकर पवित्र एवं स्वच्छ होकर बाहर निकले ।कई घरों में देखा है सबसे पहले कोने में स्नानघर की टंकी, नल और उसके पश्चात शौचालय की शीट बना देते हैं ।इससे हानि यह होती है कि आप शौच जाकर स्नान करते हैं और स्नान करके शौच की शीट लांघकर बाहर आते हैं। इससे आप शुद्ध तो हो सकते हैं, लेकिन पवित्र नहीं हो सकते हैं। और शास्त्रों में ऐसी पवित्रता का वर्णन किया गया है। यदि उत्तर अथवा पूर्व में शौचालय बना हुआ है ।उस घर के बालकों के लिए हानि
कारक है ,बच्चों से संतुष्टि नहीं मिलती ,विद्या अध्ययन में बाधा आती है अथवा अथवा संतान के स्वास्थ्य में दिक्कतें आती हैं। कई बार तो ऐसे देखागया है कि संतान देर से होती हैं ।फिर भी यदि किसी भवन में ऐसी दिक्कतें हैं ।शौचालय नॉर्थ ईस्ट में ही बना है तो उसके लिए आप कुछ उपाय कर सकते हैं सबसे पहले बाथरूम में पीला पेंट कराएं, पीला बल्ब लगाएं। शौचालय की शीट से 3:50 फीट ऊपर आमने सामने समानांतर दो शीशे लगाएं, ताकि वहां की नकारात्मक ऊर्जा वहीं पर टकराकर डिस्पोज हो जाए।
ऐसे शौचालय में साबुत नमक कांच की प्लेट में भरके किसी कोने में रख सकते हैं ।हर महीने के बाद उसे बदलते रहें।
शौचालय कभी भी जीने के नीचे ना बनवाएं ।इससे परिवार के लोगों में कब्ज, पाइल्स आदि की बीमारी हो सकती है।
शहरों में अधिकतर सीवर लाइन पडी हुई है ।लेकिन कहीं-कहीं अविकसित कालोनियों में या गांव में शौचालय के निकट सेप्टिक टैंक बनाते हैं। सेप्टिक टैंक हमेशा नॉर्थ वेस्ट या पश्चिम दिशा में बनाना अच्छा रहता है ।स्थान न मिले तो दक्षिण पूर्व में भी बना सकते हैं लेकिन यह केवल एक विकल्प है ,हल नहीं ।यदि आपके उत्तर अथवा पूर्व में सेफ्टी टैंक बना हुआ हैतो घर से बीमारी में पैसा अनावश्यक खर्च होता रहेगा। इससे बचने के लिए सेप्टिक टैंक के ढक्कन के नीचे तांबे की प्लेट फिक्स करा दें। और यदि सैप्टिक टैंक दरवाजे के पास है तो उसके ऊपर कुछ गमले रख दें।
पंडित शिवकुमार शर्मा, आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रत्न
अध्यक्ष- शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद
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