*रहिमन वे कैसे निभें,बेर केर के संग।
वे बोलते रस आपने,उनके फाटत अंग।।*
अर्थात् रहीम कवि कहते हैं कि दो विपरीत विचाधाराओं की संस्कृति एक साथ अधिक देर /दिनों तक जीवित नहीं रह सकती है,जैसे बेर व केले के पेड़ पास पास होने से परेशानी होती है। क्योंकि बेर का पेड़ जब भी हवा में मस्त होकर झूमेगा केले के पत्ते बेर के कांटों से छिन्न भिन्न हो जाएंगे।
ठीक यही स्थिति आज भारत में है,एक धर्म ( केला) तो दूसरे धर्म कौ ठेस न पहुंचे के या आहत होने के कारण अपनी खुशियों को ठीक से प्रकट नहीं कर सकता , किन्तु दूसरे धर्म के लोग (बेर) हर क्षण भारतीय संस्कृति पर प्रहार करने से नहीं चूकते हैं।
भारत में ऐसा कब तक होता रहेगा?
मोदी जी व शाह जी , कृपया इन्हें हद में रहने के कानून शीघ्रताशीघ्र बनाये।
आज भी बाबर के साले ,सगे सम्बन्धी श्रीराम मंदिर के बारे में अनाप-शनाप बोल रहे हैं।
क्या इन हरामखोरो के लिए कुछ भी बोलने की खुली छूट दे रखी है।
अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ ये नहीं कि कोई हमारे देश , संस्कृति व धर्म को गाली दें, और उनके खिलाफ कोई एफ आई आर , गिरफ्तारी भी ना हो , संविधान में ऐसा लिखा है तो कार्यवाही क्यों नहीं।
अगर नहीं लिखा है तो बदल डालो ऐसे संविधान को।
अगर संविधान नहीं बदला गया या संशोधन नहीं किया गया तो हमारे देश में पल रहे विषधर हमारी संस्कृति व हमारे देश को निगल लेंगे।
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