अब तो आशियानों में भी डर लगता है। (कविता)

27Oct
*स्वरचित कविता*
*अब तो आशियानों में भी डर लगता है*
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई कई जिंदगियां,
अब तो आशियानों में भी डर लगता है।।
मौत से आगे कुछ भी नहीं है यहां पर,
किंतु अब तो श्मशानों में भी डर लगता है।
कितना गिरेगा ,हे मानव अपने स्वार्थ में तू,
अब तो तेरे बनाए मकानों में  भी डर लगता है।
मिलावट की जिंदगी में जी रहे हैं हम सब,
अब तो मिलावटी दुकानों में भी डर लगता है।
बुझ गये   कई चिराग अपने ही घरों के,
अब तो अपना घर बसाने में भी डर लगता है।
भरे नहीं हे मानव तेरी इच्छाओं के घड़े,
क्यों नहीं तुझे किश्तियां डुबाने में डर लगता है।
इतना गिरेगा है मानव हमें यकीन नहीं था,
क्या नहीं तुझे अपनों को ही रुलाने में डर लगता है।।
पंडित शिवकुमार शर्मा ,आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रात में

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