(खगोल चर्चा) Dark Energy या श्याम ऊर्जा का वैदिक सम्बन्ध

27Oct
*खगोल चर्चा*
*Dark energy (श्याम ऊर्जा) का वैदिक सम्बन्ध*
इस ब्रह्मांड में संपूर्ण खाली स्थान में एक आश्चर्यजनक ऊर्जा विद्यमान है, जिसे खगोल वैज्ञानिक डार्क एनर्जी अथवा श्याम ऊर्जा के नाम से जानते हैं। वास्तव में ब्रह्मांड में खाली जगह असल में खाली जगह नहीं है, वहां पर आश्चर्यजनक ऊर्जाएं पाई जाती हैं। ब्रह्मांड में खाली जगह जहां पर प्रकाश का परावर्तन नहीं होता, वहां पर श्याम पदार्थ अर्थात डार्क मैटर पाया जाता है इन्हीं श्याम पदार्थों के कारण उत्पन्न ऊर्जा को श्याम ऊर्जा या डार्क एनर्जी कहते हैं।
ब्रह्मांड में विद्यमान 20 खरब से अधिक आकाशगंगा ,उनका निर्माण करने वाले ग्रह नक्षत्र व उनके मध्य के श्याम पदार्थ का अंश  26% है। ब्रह्मांड में शेष 74% इस रहस्यमयी अदृश्य श्याम ऊर्जा का है ।इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि ब्रह्मांड में संपूर्ण दृश्य भाग या पदार्थ एक चौथाई भाग  तथा तीन चौथाई भाग अदृश्य श्याम ऊर्जा का है।
ऐसे श्याम ऊर्जा  को खगोल शास्त्र के शीर्ष वैज्ञानिकों ने 1990 के दशक में खोजा था। लेकिन हमारे वेद ऋग्वेद के 10/90/3 व 10/90/4 क्रमांक के 2 मंत्र पुरुष सूक्त के नाम से जाने जाते हैं।(में ऐसे अद्भुत श्याम ऊर्जा  1: 3 का अनुपात पहले से ही दिया गया है) प्रमाण रूप में आप इन मंत्रो को देखें:
*एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरूष:* ।
*पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि*।।
अर्थात ऐसे विराट पुरुष रूपी ब्रह्मांड की शक्ति  बहुत विशाल है। इस विराट ब्रह्मा के 1 चरण में जड़ चेतन दृश्य जगत है और 3 भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित है।
दूसरा प्रमाण:.
*त्रियादूर्व उदैत्पुरूष: पादोऽस्येहाभवत्पुन:।*
*ततो विश्वॾ•व्यक्रामत्साशनानशने अभि।।*
अर्थात चारों भागों वाले इस विराट ब्रह्मा के एक भाग में यह सारा संसार जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है और इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में समाए हुए हैं।.
श्याम ऊर्जा बहुत ही ताकतवर गुरुत्वाकर्षण बल रखती है। अंतरिक्ष में जो भी तारे, ग्रह , आकाशगंगाओं की रचनाओं में स्थायित्व व्यवस्था, संतुलन, गति; परिक्रमण और परिभ्रमण, ग्रहों के अक्ष बिंदु, परिपथ आदि को ब्रह्मांड की श्याम ऊर्जा ही संतुलित करती है।
ऋग्वेद सहित संपूर्ण वैदिक साहित्य में इंद्र को शक्ति और ब्रह्मांड की गति में जो भूमिका दी गई है, उसके आधार पर इस विलक्षण सामर्थ्य से युक्त चेतना *श्याम पदार्थ* अर्थात *इंद्र* के तत्सम होना बहुत ही तर्कसंगत लगता है। 
अर्थात वेदों में इंद्र  वह शक्ति है जिसने पृथ्वी सहित समस्त ग्रहों, नक्षत्रों ,आकाशगंगाओं से  युक्त ब्रह्मांड को कंपन  व विचलन रहित करके व्यवस्थित एवं संचालित किया  है। कोई भी ग्रह तारा अपनी गति करते समय एक दूसरे से कभी भी टकराते नहीं है ।यह वैदिक ज्ञान खगोल शास्त्र में बहुत ही महत्व रखता है।
हम अंग्रेजी मानसिकता के इतने आदी हो चुके हैं कि हमें वेस्टर्न कल्चर के साहित्य से बहुत प्रेम हो गया है ,किंतु अब हमने अपने वैदिक साहित्य को भुला दिया है। अभी वैदिक साहित्य में शोध होना बाकी है ।संसार ,विश्व, ब्रह्मांड की सारी परतें खुलती नजर आएंगी और इसके अलावा भी मानव जीवन के कल्याण के लिए उपयोगी रास्ते स्वयं ही  निकल जाएंगे।
वैज्ञानिकों के विश्लेषण के अनुसार हमारे सौरमंडल के साथ-साथ इस ब्रह्मांड में 400 से 500 अरब तारे हैं और ऐसी ही छोटी बड़ी 20 खरब से अधिक आकाशगंगा इस ब्रह्मांड में फैली हुई है ,इसलिए वेदों में नेति नेति अर्थात कहीं भी अंत नहीं है ऐसा कहा गया है।
ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में बताया गया है ;एक अनुमान के अनुसार एक सिरे से आरंभ करके  प्रकाश की गति 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड होने पर भी दूसरे सिरे पर पहुंचने के लिए 91 सौ करोड़ से अधिक वर्ष तक जाएंगे । यह है ब्रह्मांड का विस्तार। जिसे  आज विश्व के वैज्ञानिक,  खगोल शास्त्री आज उद्घाटित कर रहे हैं, वह लाखों वर्षों से हमारे वैदिक साहित्य में समाया हुआ है। 
य: पृथिवीं व्यथमानामंदृहद्
य: पर्वतान्प्रकृपिता अरम्णात्।
तो अन्तरिक्षं विममे वरीयो
तो द्यामस्तभ्नात्स जनाब इन्द्र: ।
                 ऋग्वेद 2/12/2
वेदों में सांकेतिक , रूपकात्मक विवेचन आधुनिक ज्ञान के अनेक रहस्य संजोए हुए हैं ।आवश्यकता है, वेदों का सही अध्ययन अध्यापन और स्वाध्याय करने की।
पंडित शिवकुमार शर्मा, आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषी रत्न 
अध्यक्ष ,शिवशंकर ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केंद्र ,गाजियाबाद

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