वास्तु सबके लिए (भाग-3)

27Oct
वास्तु है सबके लिए (भाग 3)
*पूर्व दिशा का महत्व*
 वास्तु शास्त्र के अनुसार व खगोलीय नियमानुसार पूर्व दिशा का विस्तार 67.5 अंश से 112.5
अंश तक होता है , जो वास्तविक पूर्व दिशा का मान 45 अंश है। पूर्व दिशा से उत्तर की ओर ईशान व दक्षिण की ओर आग्नेय उपदिशाएं है ।
पूर्व दिशा के स्वामी बृहस्पति है जो ज्ञान , बुद्धि विवेक , आध्यात्म व समृद्धि के स्वामी हैं।
वास्तु शास्त्र में इस दिशा को सबसे श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि सूर्य इसी दिशा में उदित होते हैं।प्रकाश का प्रसार इसी दिशा से आरंभ होता है।
गृह निर्माण में इस दिशा को पवित्र व हल्की रखने का आदेश दिया गया है। इसमें हल्का निर्माण, ऊंचाई कम या खुला स्थान रखें।
मंदिर, अध्ययन कक्ष,स्नानघर, आध्यात्मिक गतिविधियाें का स्थल, बैठक कक्ष आदि इस दिशा में शुभ होते हैं।घर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में शुभ होता है।
इस दिशा के अच्छा व वास्तु के अनुरूप होने से वंश वृद्धि,धन में बरकत व समृद्धि बनी रहती है।
इस दिशा में शौचालय,स्टोर , रसोईघर,इन्वर्टर आदि विद्युत उपकरण ठीक नहीं होते हैं।
इससे घर में धन की आवक कम हो जाती है,क्लेश का वातावरण हो जाता है , बच्चों के स्वास्थ्य पर
प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पं . शिवकुमार शर्मा, अध्यक्ष-शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केन्द्र गाजियाबाद
9811893069
Pt. Shiv Kumar Sharma

One Reply to “वास्तु सबके लिए (भाग-3)”

Your Email address will not be published.