*श्राद्ध पक्ष और हमारे कर्त्तव्य*
“श्रद्धा दीयते इति श्राद्ध:”जो दान चाहे वह भोजन का हो या अन्न का हो श्रद्धा पूर्वक दिया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं। हिंदू शास्त्रों में श्राद्ध कर्म एक विशेष प्रयोजन से किया जाता है।हिन्दु धर्म में मान्यता है कि पितृपक्ष में हमारे पितर पृथ्वी पर आते हैं ,उनके वंशज उनके नाम से ब्राह्मणों को भोजन कराने से वे तृप्त होकर और आशीर्वाद देकर अपने धाम चले जाते हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में श्राद्ध पक्ष का आगमन होता है कन्या राशि में सूर्य के आने से इसे *कन्याऽर्कागत:* अर्थात कनागत भी कहते हैं। कहते हैं कि महादानी कर्ण ने जीवन भर सोना, चांदी, भूमि ,घोड़े आदि दान किए थे ।मरणोपरांत जब वह धर्मराज के पास पहुंचे उन्हें नरक की सजा सुनाई गई। कर्ण ने व्याकुल होकर कहा, महात्मन्! मैंने तो जीवन भर बहुत दान किए हैं ,तो मेरी ऐसी नरक गति क्यों है? धर्मराज बोले तुमने सोने, चांदी ,घोड़े ,हाथी ,भूमि का दान किया है।जो अपने किसी प्रयोजन के लिए किया था ,इसमें किसी गरीब का भला नहीं हुआ। आपने कभी अन्न और भोजन का दान नहीं किया इसलिए आपकी ऐसी गति हुई है ।क्योंकि कीमती वस्तुओं के दान से बेहतर अन्न दान होता है। तब कर्ण ने अनुनय विनय करते हुए कहा, आप मुझे कुछ समय और दीजिए मैं अपनी इच्छा पूरी करना चाहता हूं ।धर्मराज ने उनको 16 दिन दिए ।कर्ण पुनः धरती पर वापस आए और 16 दिन तक गरीबों एवं ब्राह्मणों को दान दिया तथा भोजन कराया तब उससे उसके पितर प्रसन्न हो गए तथा कर्ण ससम्मान स्वर्ग चले गए।
शास्त्रों में उल्लेख है की ईश्वर की अपेक्षा अपने पितर शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि ईश्वर तो पूरी सृष्टि का ध्यान रखते हैं, किंतु पितर केवल अपने कुल के लोगों का ध्यान रखते हैं और श्राद्ध कर्म से प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि, सम्मान, प्रतिष्ठा की वृद्धि ,घर में धन की बरकत आदि देते हैं।
*श्राद्ध करने की कुछ नियम*
*श्राद्ध करने का अधिकारी पुत्र होता है पुत्र ना हो तो भतीजा, भानजा ,दोहित्र(धेवता) होता है।
*अपने पूर्वजों के निमित्त के योग्य विद्वान ब्राह्मण को आमंत्रित कर भोजन कराना चाहिए। इसके पश्चात गरीबों को भी अन्न का दान करना चाहिए।
*पितरों के निमित्त श्राद्ध कुतप काल (11:36 बजे से
12:24 बजे) में ही करना चाहिए।
*श्राद्ध में गाय का घी, दूध, दही का प्रयोग अच्छा माना गया है।
*श्राद्ध कर्म में गेहूं ,सरसों, जौ, धान, कंगनी से पूरित भोजन से पितर तृप्त होते हैं।
*श्राद्ध में लहसुन, प्याज , मसूर,पेठा, लौकी ,चना ,छोला, काला नमक, बैंगन आदि वर्जित है।
*जहां श्राद्ध कर्म करना हो, उस स्थान पर थोड़े से काले तिल बिखेर देवें ताकि वहां से अपवित्र शक्तियां चली जाएं और अपने पितरों का आगमन हो।
*सोना ,चांदी ,तांबेके पात्रों में पितरों के लिए भोजन निकालना चाहिए।
*श्राद्ध में पिण्डों को गाय या बकरी को खिला दे अथवा बहते पानी में छोड़ दें।
*श्राद्ध के समय एक हाथ से पिण्ड दान व अग्नि में आहुति दें, तथा तर्पण दोनों हाथों से करें।
*जिन लोगों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम होती है उनके श्राद्ध हेतु कुछ तिथियां निर्धारित की गई हैं।
*सौभाग्यवती महिलाओं के लिए नवमी को श्राद्ध करना चाहिए। *जिनके पितर युद्ध में मारे गए हैं अथवा जिनका दुर्मरण हुआ
है ,उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को
करना चाहिए।
*जिनके पितरों की मृत्यु स्वभाविक रूप से हुई है ,उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि को करना चाहिए।
*श्राद्ध में मामा भांजा गुरु दामाद भाई को भोजन कराना श्रेष्ठ माना गया है ।
*श्राद्ध के भोजन पर मित्रों को निमंत्रण नहीं देना चाहिए।
पंडित शिवकुमार शर्मा
अध्यक्ष शिव शंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद
फोन नंबर 9811893069
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