*शरद पूर्णिमा पर विशेष*
*अब चंदा भी कहां से अमृत बरसाएगा*
अमृत बरसाती चंदा की किरणें कितनी दूर हो गई।
इस प्रदूषण के कारण जिंदगी मजबूर हो गई ।।
सावधान ! अमृत नहीं अब छत पर, प्रदूषण का भय है।
संभल के रहना प्यारे भक्तों ,अब कौन कहां निर्भय है ।।
वायु ,जल ,धरती सब तुमने प्रदूषित कर डाली।
अमृत जैसी किरणों से, पृथ्वी वंचित कर डाली।।
अब चंदा भी कहां से ,धरती पर अमृत बरसाएगा।
शरद पूर्णिमा का उत्सव ,अब फीका ही रह जाएगा।।
क्या पराली ही कारण है, इस खतरनाक प्रदूषण का।
क्या हमारे वाहनों ने, कार्य किया नही खर दूषण का।।
उद्योगों से जहरीला धुआं निकलता,
मानवता को डस लेगा।
आधुनिकता की दौड़ में, तू कहां जाकर दम लेगा।।
आपाधापी की जिंदगी में अब तू, चैन कहां से पाएगा ।
ठहर जा कुछ दिन और , मानव अस्तित्व ही मिट जाएगा।।
शिवकुमार शर्मा उप -प्रधानाचार्य, सरस्वती शिशु मंदिर, नेहरू नगर, गाजियाबाद
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