दशहरा पूजन की सूक्ष्म विधि
दशहरा अर्थात विजय दशमी आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाता है ।इस बार यह तिथि 25 अक्टूबर को आ रही है। इसी दिन दशहरा पूजन होगा। वैसे तो दशहरा पूजन की विशिष्ट विधि होती है। किन्तु जनसामान्य के लिए दशहरा पूजन की सूक्ष्म विधि यहां प्रस्तुत है ।
सबसे पहले अपने घर के आंगन में गाय का गोबर लाकर 10 छोटे-छोटे उपले /कंडे बनाएं। आटे से चोक पूरकर उसके दोनों ओर 5-5 कंडे स्थापित करें। कंडों में नवरात्रों में बोए गए जौ के नौरते के कुछ पौधे निकालकर उन कण्डों पर स्थापित करें। थोड़ी-थोड़ी दही और लगा दे। इसके पश्चात उसके ऊपर चारपाई आदि बिछायें। यदि चारपाई ना हो तो वैसे ही रहने दें। कण्डों के बीच में अपने घर के सामान्य अस्त्र लाठी ,भाला अथवा लाइसेंसी हथियार भी रखें। एक थाली में 10 कुल्ह़ों (मिट्टी के छोटे छोटे पात्र) मैं खील बताशे भरकर रखें। सामान्य पूजन में गणेश जी की मूर्ति अथवा कोई प्रतीक रखें। परिवार के सभी सदस्य चारों और बैठ जाएं मुख्य यजमान पूर्व को मुंह करके बैठे । और हाथ में चावल खील अथवा पुष्प लेकर कुछ मुद्रा रखकर यह संकल्प करेंं।
आज संवत 2077 द्वितीय आश्विन मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को मैं——-(गोत्र का उच्चारण करें) में उत्पन्न———(अपना नाम बोले) मां दुर्गा, भगवान श्री राम को प्रसन्न करने के लिए घर में सुख शांति,समृद्धि और सर्वत्र विजय प्राप्ति के लिए मैं दशहरा पूजन कर रहा हूं ।ऐसा कहकर हाथ में रखा हुआ सामान गणेश जी के सम्मुख छोड़ देंगे ।रोली, चावल मिष्ठान आदि से गणेश जी की पूजा करेंगे और यह मंत्र बोलेंगे।
गजानन भूतगणादि सेवितं कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम्। उमा सुतं शोक विनाशकारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।
इसके पश्चात भगवान श्री राम जी के इस मंत्र से पुष्पादि छोड़ेंगे। रामाय रामचंद्राय रामभद्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नमः।
भगवान राम के आवाहन के बाद शस्त्र पूजन करेंगे ।सभी शस्त्रों में कलावा बांध देंगे ।रोली का टीका लगाएंगे और चावल अथवा खील छोड़ेंगे। और इस मंत्र को बोलेंगे
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशौ क्षयाशुंगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय ममाग्रत:पथि सदैव गच्छताम्। .
मां भगवती को भी रोली चावल मिष्ठान अर्पण करें और यह मंत्र बोलें।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
इस दिन क्षत्रियों में शमी के वृक्ष अथवा पत्तियों का भी पूजन होता है ।ऐसा माना जाता है कि जब पांडव अज्ञातवास बिताने के लिए विराट नगरी पहुंचे थे, तो अपने सभी अस्त्र-शस्त्र नगर के बाहर शमी के वृक्ष पर छिपा दिए थे और शमी के वृक्ष ने उन शस्त्रों की पूरे वर्ष रक्षा की थी। भगवान राम ने भी राम रावण युद्ध से पहले शमी का पूजन कर मृत्यु देव से विजय का वरदान लिया था। तो अपने शस्त्रों को रक्षा करने के लिए, उनका बल बढ़ाने के लिए हमें शमी के पत्तों अथवा वृक्ष का पूजन करना चाहिए।
शमी का पूजन निम्न मंत्र का
पाठ करते हुए करें ।
शमी शमय मे पापं शमी लोहितकंटका।
धारिण्यर्जुन बाणानां रामस्य प्रियवादिनी॥
करिष्यमाणयात्रायां यथाकालं सुखं मम।
तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते ॥
सभी सदस्यों को घर के बड़े परिजन कलावा बांधे व तिलक लगाएं।
इसके पश्चात सभी सदस्य अपने हाथ में खील अथवा पुष्प लेकर के दशहरे की तीन या पांच परिक्रमा करें। यह मंत्र बोले ।
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु , प्रदक्षिणा पदे पदे।।
परिक्रमा के बाद आवाहित देवताओं को विसर्जन कर दें
तथा प्रसाद खील बताशे सबको बांट दें।
पंडित शिवकुमार शर्मा आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिष रत्न।
अध्यक्ष- शिवशंकर ज्योतिष एवं वास्तु संधान केंद्र, गाजियाबाद
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